रचनात्मक पत्रकारिता का अर्थ खबरों में सकारात्मकता रखनाः प्रो. अरुण कुमार भगत

आईआईएमटी न्यूज डेस्क, ग्रेटर नोएडा



महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के मीडिया अध्ययन विभाग द्वारा 'गुरुमंत्र ई-संवाद श्रृंखला' के तहत "पत्रकारिता की रचनात्मक विधाएं'' विषय पर कार्यक्रम आयोजित हुआ। अध्यक्षता महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. संजीव कुमार शर्मा ने की। वहीं विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति प्रो. जी गोपाल रेड्डी का विशेष सानिध्य भी प्राप्त हुआ । मुख्य अतिथि बिहार लोक सेवा आयोग के माननीय सदस्य प्रो. अरुण कुमार भगत थे। स्वागत उद्बोधन एवं अतिथि परिचय मीडिया अध्ययन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ प्रशांत कुमार ने की।

अध्यक्षीय उद्बोधन में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर संजीव कुमार शर्मा ने कहा कि मीडिया अध्ययन विभाग से उनका संपर्क बहुत आत्मीयता का है। उन्होंने मुख्य अतिथि प्रो. अरुण कुमार भगत की विशिष्टता को रेखांकित करते हुए कहा कि मीडिया अध्ययन विभाग के छात्रों को व्यवस्थित रहने का गुण उनसे सीखने की जरूरत है। उन्होंने विभिन्न समाचार पत्र एवं साप्ताहिक अखबारों की चर्चा करते हुए कहा की रचनात्मकता सिर्फ राजनीति में नहीं अपितु प्रत्येक क्षेत्र में है। समाचार पत्रों में संपादकीय पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा की वह अब सिर्फ राजनीतिक बनकर रह गए हैं, जरूरत है उसमें रचनात्मकता लाने की। मीडिया विभाग के छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के छात्रों को साहित्य, अर्थशास्त्र, फिल्म, भूगोल, खेल समेत सभी क्षेत्रों की व्यापक जानकारी होनी चाहिए तथा भाषा और साहित्य की दृष्टि से समृद्ध होने की भी जरूरत है।

विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति प्रो. जी गोपाल रेड्डी ने कोविड काल में मीडिया की भूमिका पर चर्चा करते हुए कहा कि मीडिया अपनी भूमिका खुद तय कर सकती है और देश में चल रही वैक्सीनेशन के प्रति लोगो को जागरूक कर सकती है। उन्होंने बताया कि किस तरह मीडिया ने इमरजेंसी के दौरान अपनी दायित्व बखूबी निभाया था। उन्होंने कहा कि मीडिया को सकारात्मक रुख अपनाते हुए वैक्सीनेशन के खिलाफ फैल रही भ्रांतियों पर पूर्णविराम लगाना चाहिए।

बतौर मुख्य अतिथि प्रो. अरुण कुमार भगत ने कहा की पत्रकारिता में राष्ट्रीय विकास सम्बन्धी विषय प्राथमिकता से आनी चाहिए। परोपकार की भावना समृद्ध होनी चाहिए परंतु ऐसी चीजों के ना होने के परिणाम स्वरूप हमें नकारात्मक प्रवृत्ति के समाचार का महत्व अधिक दिखाई पड़ने लगता है। उन्होंने कहा कि नकारात्मक प्रवृत्ति के समाचार सकारात्मक प्रगति के समाचार को पीछे धकेल दिए जा रहे हैं और जनजीवन का कृष्ण पक्ष शुक्ल पक्ष पर हावी होता जा रहा है। रामायण की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि नकारात्मकता पर सकारात्मकता की विजय का प्रतीक है रामायण। आगे जोड़ते हुए उन्होंने कहा की रचनात्मक पत्रकारिता से मानव के जीवन का सकारात्मक पहलू उजागर होता है। रचनात्मक पत्रकारिता के अर्थ को समझाते हुए उन्होंने कहा कि सामाजिक जीवन में सकारात्मकता पैदा करना और युवा शक्ति में प्रेरणा जागृत करना तथा राष्ट्र निर्माण के लिए कार्य करना ही रचनात्मक पत्रकारिता है। प्रो. भगत ने कहा कि राष्ट्र में संप्रभुता एकता और अखंडता बनाए रखने के लिए भी पत्रकारिता एक अहम योगदान देता है इसलिए खबरों में सकारात्मकता होना जरूरी है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के उज्जवल भविष्य की संरचना का दायित्व मीडिया विद्यार्थियों के ऊपर हैं।

कार्यक्रम के विशिष्ट वक्ता डॉ. अनिल निगम,अधिष्ठाता, आईआईएमटी कॉलेज नोएडा ने कहा कि भारत में पत्रकारिता का एक गौरवशाली इतिहास रहा है और मीडिया समाज में ओपिनियन लीडर की भूमिका निभाता है। महात्मा गांधी की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा की महात्मा गांधी ने 'हरिजन' में लिखा था कि पश्चिम की तरह पूर्व में भी अखबार लोगों के लिए बाइबल और गीता बनती जा रही है और लोग छपी हुई बातों को ईश्वर के रूप में सत्य मान लेते हैं। उन्होंने कहा की मीडिया की समाज और देश के प्रति एक अहम जिम्मेदारी है। उन्होंने मीडिया की विश्वसनीयता पर भी चर्चा की । उन्होंने कहा कि समाज की छोटी से छोटी जानकारी जनता तक पहुंचा कर परमार्थ करना ही पत्रकारिता का मूल धर्म है। आगे जोड़ते हुए उन्होंने कहा की समाचार तथ्यों के आधार पर तो होना चाहिए लेकिन उसे प्रभावी और रुचिकर बनाने के लिए रचनात्मकता की जरूरत होती है। उन्होंने कहा की पत्रकारिता का बाजारीकरण तो समय की मांग है है लेकिन पत्रकार का बाजारू होना बिल्कुल गलत है।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि डॉ. रितु दुबे, प्रिंसिपल, निस्कार्ट मीडिया कॉलेज, गाजियाबाद ने अपने संबोधन में नारद ऋषि को आदि पत्रकार बताते हुए कहा कि कुछ देश विरोधी तत्व नारद ऋषि तथा सनातनी संस्कृति का अपमान कर रहे हैं। उन्होंने ऐसे कृतियों को संदर्भ से खिलवाड़ बताया तथा सभी का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि हमारे गौरवशाली इतिहास को तोड़ मरोड़ कर प्रेषित करने के कारण युवाओं को वह जानकारी नहीं मिल पा रही या फिर विकृत रूप में पहुंच रही है जिससे उनका फायदा होने की जगह नुकसान हो रहा है। उन्होंने तत्कालीन पत्रकारिता को रेखांकित करते हुए कहा कि आज की पत्रकारिता आरोप और प्रत्यारोप की पत्रकारिता बन गई है। जबकि पत्रकारिता का धर्म राष्ट्र निर्माण का है। उन्होंने कहा पत्रकारिता देश के विभिन्न घटकों के बीच संवाद स्थापित करती है इसलिए इनका रचनात्मक होना अनिवार्य है। आगे जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए विभिन्न घटकों के सहयोग की आवश्यकता होती है और पत्रकारिता का भी इसमें अहम योगदान है। उन्होंने कहा की राष्ट्रीय विचारधारा वाले पत्रकारों पर विभिन्न देश विरोधी संगठनों तथा तत्वों द्वारा दबाव बनाए जा रहे हैं चाहे वह मीडिया ट्रायल के नाम पर हो या फिर पक्षकार या पत्रकार के नाम पर।